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पीटीआर की खुली सीमा, बंद जिम्मेदारी- सिस्टम की लापरवाही से गई छोटेलाल की जान

पीटीआर की खुली सीमा, बंद जिम्मेदारी- सिस्टम की लापरवाही से गई छोटेलाल की जान

पीलीभीत। जंगल से आया बाघ खेत में उतरा, और एक मेहनतकश किसान को मौत के घाट उतार गया। लेकिन असली शिकारी बाघ नहीं — वो तंत्र है जिसने वर्षों से लापरवाही और अकर्मण्यता के जंगल उगा रखे हैं। टांडा छत्रपति गांव के पास जब किसान छोटेलाल (40 वर्ष) का अधखाया शव बुधवार सुबह मिला, तो गांव सिहर उठा। पर वन विभाग के अफसरों की आंख तक नहीं फड़की। क्योंकि उनके लिए यह “रोज़मर्रा की घटना” है। छोटेलाल मंगलवार को अपने खेत में गेहूं की बुवाई की तैयारी कर रहे थे।

बराही रेंज के पताबोझी वन चौकी से महज़ कुछ ही दूरी पर झाड़ियों में छिपे बाघ ने उन पर हमला किया। हमले की आवाज चौकी तक पहुंची, ग्रामीण मदद के लिए दौड़े —

मगर चौकी पर ताला लटक रहा था!

वनकर्मी पूरे स्टाफ सहित भाग चुके थे। विभाग जंगल के अंदर और बाहर की घटना में उलझा हुआ है। अगर अंदर की घटना है तो ग्रामीण वहां कैसे पहुंचा यह जिम्मेदारी किसकी है। कहा जाता है कि हमला उनकी आंखों के सामने हुआ, लेकिन उन्होंने न किसान को बचाने की कोशिश की, न बाद में बचाव दल बुलाया। क्या यह सिर्फ डर था, या “ड्यूटी से पलायन” की पुरानी सरकारी बीमारी। पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR) का दावा है कि वह “बाघों के संरक्षण में देशभर में अग्रणी” है। मगर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है —

रिजर्व की सीमाओं पर कोई स्थायी फेंसिंग नहीं। कैमरा ट्रैप सिस्टम महीनों से खराब पड़े हैं। ग्रामीणों को कोई पूर्व चेतावनी नहीं दी जाती। वन चौकियां सिर्फ नाम की हैं — “निगरानी” कागजों में सीमित है। हर साल पीटीआर के बजट में करोड़ों रुपये खर्च दिखाए जाते हैं, पर जमीनी हकीकत यह है कि बाघ खेतों तक पहुंच चुके हैं और इंसान चौकियों से भाग रहे हैं। अनाथ हुए पुष्पा और आकाश का जंगल ने सब कुछ छीन लिया।ग्रामीणों की मांग है —“मुआवजा नहीं, जिम्मेदारी चाहिए।”

लेकिन वन विभाग के अफसरों की जुबान पर वही रटा-रटाया बयान — “मामले की जांच की जा रही है।”जांच के नाम पर सालों से फाइलें धूल खा रही हैं, और बाघ इंसानों के करीब आते जा रहे हैं।

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 जंगल में बाघ नहीं व्यवस्था भटक गई

 

पिछले कुछ वर्षों में दर्जनों मौतें हो चुकी हैं,

मगर किसी वनाधिकारी पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। हर बार मुआवजा देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।सवाल है जब हमले लगातार हो रहे हैं, तो जिम्मेदार कौन है?क्यों अब तक पीटीआर में स्थायी सुरक्षा तंत्र नहीं बना? क्यों हर मौत के बाद सिर्फ “प्रेस नोट” जारी कर दिया जाता है?

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 अब भी नहीं चेता सिस्टम, तो फिर कोई बेगुनाह होगा शिकार

 

छोटेलाल की मौत महज़ एक हादसा नहीं, बल्कि एक सिस्टम की शवयात्रा है। अभी भी ध्यान नहीं दिया गया तो फिर कोई देखने शिकार हो जाएगा। यह मौत चीख-चीख कर कह रही है कि “संरक्षण” सिर्फ रिपोर्टों में है, जमीनी हकीकत में नहीं। अगर पीटीआर प्रशासन ने अब भी सीमाओं को सुरक्षित करने, वन चौकियों में जिम्मेदारी तय करने और गांवों में सुरक्षा जागरूकता बढ़ाने के कदम नहीं उठाए — तो अगली बार किसी और खेत में, किसी और किसान का अधखाया शव मिलेगा,

और वही पुराना बयान सुनाई देगा —

“मामले की जांच की जा रही है…”

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खुली सीमाएं, बंद निगरानी तंत्र

 

पीलीभीत टाइगर रिजर्व की महोफ, माला, दियूरिया, हरिपुर व बराही रेंज में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। सीमाएं वर्षों से “खुली” हैं। ग्रामीण बार-बार चेतावनी देते रहे कि बाघ खेतों तक आ रहे हैं, बच्चों और महिलाओं तक की जान जोखिम में है। लेकिन विभाग के अफसर हर बार वही पुराना जवाब देते हैं — “बाघ रिजर्व का हिस्सा हैं, हम निगरानी कर रहे हैं।” हकीकत यह है कि निगरानी चौकियां सूनी हैं, कैमरे खराब हैं, और गश्त सिर्फ कागजों में होती है।

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बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष, घटती जवाबदेही

 

पीलीभीत जिले में पिछले कुछ वर्षों में बाघ-मानव संघर्ष की घटनाएं दर्जनों में हैं। बावजूद इसके न तो गांवों के पास बफर जोन में कोई सुरक्षा योजना बनी, न ही वन चौकियों को सशक्त किया गया। वन विभाग के पास अब भी गश्ती वाहनों की कमी, ड्रोन सर्विलांस का अभाव, और आपदा प्रतिक्रिया दल की अनुपस्थिति है। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी हैअगर बाघ की गतिविधियों की जानकारी विभाग को पहले से थी, तो ग्रामीणों को चेतावनी क्यों नहीं दी गई? और जब हमला हुआ, तो वनकर्मियों ने मौके से भागकर अपनी ड्यूटी से मुंह क्यों मोड़ा?

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यह मौत एक चेतावनी है

 

छोटेलाल की मौत किसी एक परिवार का शोक नहीं, बल्कि पूरे जिले के लिए चेतावनी है।

अगर अब भी पीटीआर प्रशासन और वन विभाग ने जवाबदेही तय नहीं की, तो आने वाले दिनों में “संरक्षण” के नाम पर और भी ग्रामीण ‘संवेदनहीन सिस्टम’ के शिकार बनेंगे।

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रिपोर्ट- S. Vyast

 

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