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पीलीभीत टाइगर रिजर्व में संरक्षण और पर्यटन के नए मानक तय करने की जरूरत:अख्तर मियां

पीलीभीत टाइगर रिजर्व: सफलता की कहानी अब व्यवस्था की माँग कर रही

पीलीभीत टाइगर रिजर्व में संरक्षण और पर्यटन के नए मानक तय करने की जरूरत:अख्तर मियां खान

पीलीभीत टाइगर रिजर्व: सफलता की कहानी अब व्यवस्था की माँग कर रही

पीलीभीत।पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या और उनकी स्वछंद गतिविधियाँ अब एक नई दिशा की ओर संकेत कर रही हैं। घनी साल वनस्पति, विस्तृत घास के मैदान और प्रचुर जल स्रोतों वाले इस क्षेत्र ने न सिर्फ बाघों को सुरक्षित आश्रय दिया है, बल्कि उन्हें सहज रूप से विचरण की स्वतंत्रता भी प्रदान की है। यही कारण है कि बाघ अब कोर क्षेत्र से बाहर निकलकर बफर और आसपास के रिहायशी इलाकों तक दिखने लगे हैं।पीलीभीत टाइगर रिजर्व, उत्तर प्रदेश के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित, तराई के बाघों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध आवास प्रदान करता है।यहाँ की घनी साल वनस्पति, घास के मैदान, और जल स्रोतों की उपस्थिति इसे बाघों के लिए एक आदर्श स्थल बनाती है। बीते वर्षों में बाघों की संख्या में वृद्धि, उनकी स्वछंद आवाजाही और प्राकृतिक व्यवहार ने इस रिजर्व को एक जीवंत बाघभूमि के रूप में स्थापित किया है। लेकिन अब जब बाघ स्वाभाविक रूप से अपनी सीमाओं से बाहर भी दिखने लगे हैं, तो यह संकेत देता है कि हमें पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर एक सुव्यवस्थित व्यवस्था की आवश्यकता है।बाघों की स्वछंद आवाजाही इस बात का प्रमाण है कि पीलीभीत का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ है। वे अब सिर्फ मुख्य कोर एरिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बफर और रिहायशी इलाकों तक भी पहुँचने लगे हैं। यह उनके संरक्षण प्रयासों की सफलता है, परंतु साथ ही यह एक गंभीर संकेत भी है कि यदि उनकी गतिविधियों को समझदारी से नहीं सँभाला गया तो मानव-बाघ संघर्ष की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।वन्यजीव पर्यटन, खासकर बाघ दर्शन, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का स्रोत बना है। परंतु अनियंत्रित और अनियोजित पर्यटन से न सिर्फ बाघों की दिनचर्या बाधित होती है, बल्कि उनका व्यवहार भी बदल सकता है। तेज आवाजें, कैमरों की फ्लैश, वाहनों की अधिकता और ट्रैकों की अव्यवस्थित स्थिति बाघों के प्राकृतिक स्वभाव को प्रभावित करती है।संरक्षण में स्थानीय समुदाय की भागीदारीपीलीभीत टाइगर रिजर्व के प्रमुख जोन, जैसे हरिपुर, बराही, महोफ, माला , दियोरिया आदि, बफर ज़ोन से सटे हुए हैं। यदि इन समुदायों को वन पर्यटन से जोड़कर प्रशिक्षित किया जाए, तो ये पर्यटन के मार्गदर्शक, होमस्टे प्रबंधक या स्थानीय उत्पाद बेचने वाले बन सकते हैं। इससे उन्हें आर्थिक लाभ होगा और वे स्वयं बाघों के संरक्षण में भागीदार बनेंगे। इसके लिए नये पर्यटन गेट सीमित जिप्सी की इंट्री के साथ खोला जा सकता है।इसी के मद्देनज़र टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कन्जर्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष अख़्तर मियां खान ने पर्यटन और संरक्षण के संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया है। उनका कहना है कि अनियंत्रित पर्यटन से बाघों के व्यवहार पर प्रतिकूल असर पड़ता है। तेज़ आवाजें, अनियोजित वाहन गतिविधियाँ और मानवीय दखल उनकी दिनचर्या में बाधा उत्पन्न करते हैं।पर्यटन रूट का वैज्ञानिक निर्धारण – बाघों की उपस्थिति वाले क्षेत्रों का अध्ययन कर एक सीमित और सुरक्षित पर्यटन रूट बनाना चाहिए। जहां पर्यटन वाहन भी सीमित रहें। रुट अधिक लेकिन वाहनों की संख्या सीमित करना – हर दिन तय संख्या में वाहनों को ही अनुमति मिले, जिससे शांति बनी रहे। प्रशिक्षित गाइडों की नियुक्ति – प्रकृति गाइडों को वन्यजीव व्यवहार की समझ देकर उन्हें जिम्मेदार बनाया जाए।इको-फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर – जंगल के भीतर प्लास्टिक, शोर और रासायनिक प्रभाव को रोकने हेतु हर संभव प्रयास हों।बाघ ट्रैकिंग और निगरानी – कैमरा ट्रैप के जरिए बाघों की गतिविधियों की निगरानी जरूरी है ताकि कोई आपात स्थिति समय रहते पकड़ी जा सके।सरकार व वन विभाग की भूमिका-वन विभाग को चाहिए कि वह संरक्षण नीति को और पारदर्शी बनाते हुए स्थानीय जनसहभागिता को महत्व दे। वन पंचायतें, ईको डेवलपमेंट कमेटियां और ग्राम स्तरीय समितियाँ इसके क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।पीलीभीत टाइगर रिजर्व आज केवल बाघों की आश्रयस्थली नहीं, बल्कि मानव और वन्यजीवों के सह-अस्तित्व का एक आदर्श उदाहरण बन सकता है। इसके लिए बाघों की स्वछंदता को सहेजते हुए पर्यटन को पर्यावरण-संवेदनशील तरीके से संचालित करना अनिवार्य है। यदि पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन बना, तो यह मॉडल न केवल पीलीभीत, बल्कि देश के अन्य टाइगर रिज़र्व के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

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