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किताबों के बहाने लूट: निजी स्कूलों का कमीशन कनेक्शन उजागर”

निजी स्कूलों की मनमानी: किताबों में कमीशनखोरी से अभिभावक परेशान”

“एडमिशन से किताब तक ‘सेटिंग’ का खेल, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल”

पूरनपुर, पीलीभीत।नए शैक्षिक सत्र केआगाज़ के साथ ही जनपद में निजी स्कूलों की मनमानी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले संस्थानों में अब पढ़ाई से ज्यादा कमाई का खेल चलता दिखाई दे रहा है। दाखिले, यूनिफॉर्म और किताबों के नाम पर अभिभावकों से खुलेआम मनमानी वसूली की जा रही है। सबसे ज्यादा आक्रोश किताबों को लेकर है, जहां स्कूल प्रबंधन द्वारा अभिभावकों को तय दुकानों से ही महंगे दामों पर किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।थाना सेहरामऊ उत्तरी क्षेत्र में स्थित कई निजी स्कूलों के खिलाफ अभिभावकों में भारी नाराजगी है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल संचालक और कुछ चुनिंदा बुक सेलर्स के बीच मिलीभगत है, जिसके चलते किताबों की कीमतें बाजार से कहीं अधिक तय की जाती हैं। स्कूलों द्वारा दी गई सूची में स्पष्ट रूप से बुक स्टोर का नाम अंकित होता है, जिससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।हाल ही में कुर्रेया खुर्द कलां क्षेत्र के फत्तेपुर स्थित एक निजी स्कूल की किताबों की सूची सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, जिसने इस पूरे मामले को और तूल दे दिया है। वायरल सूची के अनुसार कक्षा 1 से लेकर कक्षा 8 तक के कोर्स की कीमतें चौंकाने वाली हैं। कक्षा 1 का कोर्स 2720 रुपये, कक्षा 2 का 2980 रुपये, कक्षा 3 का 3305 रुपये, कक्षा 4 का 3545 रुपये और कक्षा 5 का 3745 रुपये निर्धारित किया गया है। वहीं कक्षा 6 के लिए 4630 रुपये, कक्षा 7 के लिए 4790 रुपये और कक्षा 8 के लिए 5175 रुपये तक की वसूली की जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि यही किताबें खुले बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें जबरन महंगे दामों पर खरीदने को विवश किया जा रहा है।अभिभावकों का यह भी कहना है कि यदि कोई व्यक्ति बाहर से किताबें खरीदने की कोशिश करता है, तो स्कूल प्रबंधन द्वारा उसे अप्रत्यक्ष रूप से दबाव में लिया जाता है। कभी किताबों के एडिशन का हवाला दिया जाता है तो कभी यह कहा जाता है कि बाहर की किताबें पाठ्यक्रम के अनुरूप नहीं हैं। ऐसे में अभिभावक मजबूरी में तय दुकानों का ही रुख करते हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अभिभावकों के लिए यह समस्या और भी विकराल होती जा रही है। एक तरफ बढ़ती महंगाई, दूसरी तरफ बच्चों की शिक्षा का खर्च—इन दोनों के बीच आम आदमी पिसता नजर आ रहा है। कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी मासिक आय सीमित है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्हें कर्ज तक लेना पड़ रहा है।शिक्षा के नाम पर इस प्रकार की वसूली को लेकर सामाजिक संगठनों और अभिभावक संघों ने भी आवाज उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि यह पूरी तरह से नियमों के विरुद्ध है और इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। अभिभावकों ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से मांग की है कि निजी स्कूलों की इस मनमानी पर अंकुश लगाया जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।फिलहाल, सवाल यह है कि शिक्षा के नाम पर चल रहे इस खुले खेल पर आखिर कब तक लगाम लगेगी। जब तक प्रशासन सख्त रुख नहीं अपनाएगा, तब तक अभिभावक इसी तरह शोषण का शिकार होते रहेंगे। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर समस्या को कितनी गंभीरता से लेते हैं और अभिभावकों को राहत दिलाने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।

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