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जंगल मार्ग पर रात्रि बन्दी के आदेश पर आवागमन को लेकर आप ने रखे सुझाव, फिलहाल 12 मार्च तक राहत

जंगल मार्ग पर रात्रि बन्दी के आदेश पर आवागमन को लेकर आप ने रखे सुझाव, फिलहाल 12 मार्च तक राहत
पीलीभीत। वन विभाग और राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण द्वारा पिछले दिनों पीलीभीत में वन क्षेत्र से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्यमार्ग, जिला मार्ग को रात्रि में पूर्णतया बन्दी को लेकर आम आदमी पार्टी ने 06 मार्च को जिलाधिकारी को ज्ञापन के माध्यम लसे इस आदेश को वापस करने की मांग की थी। जिस पर जिलाधिकारी के द्वारा तुंरत कार्यवाही करते हुए 09 मार्च को समस्त अधिकारियों के साथ उक्त विषय पर बैठक का निर्देश दिया था। सोमवार को पीलीभीत स्थित गांधी सभागार में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई। बैठक में पुलिस अधीक्षक पीलीभीत, अपर जिलाधिकारी(वि0/रा0)पीलीभीत, प्रभागीय वन अधिकारी (पीटीआर) पीलीभीत, अधिशासी अभियंता पीडब्ल्यूडी (प्र0ख0) पीलीभीत, अधिशासी अभियंता राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण बरेली वृत्त, जिला शासकीय अधिवक्ता सिविल-राजस्व पीलीभीत एवं आम आदमी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हुए जिलाध्यक्ष अमित मिश्रा, जिला महासचिव एड0 संजय कुमार, जिलाध्यक्ष पंचायत प्रकोष्ठ-पूर्व प्रत्याशी पूरनपुर विधानसभा विनोद कुमार भारती, एड0 ओपी शास्त्री, रिंकू दिवाकर आदि उपस्थित रहे। बैठक में आम आदमी पार्टी के द्वारा कई सुझाव दिए गए। जिनमें कहा गया कि वन क्षेत्र से जुड़े हजारों ग्रामीणों का जंगल और गांव का रिश्ता सदियों पुराना है, लेकिन आज ऐसी स्थिति बन गई है कि जंगल से सटे गांवों के लोगों का जीवन दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि ग्रामीणों को अपने धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए भी लकड़ी नहीं मिल पा रही है। अंतिम संस्कार और होलिका दहन जैसे पवित्र कार्यों के लिए भी लोगों को परेशान होना पड़ रहा है। यह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि मानवीय और धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है। गरीब ग्रामीण जो वर्षों से घास, नरकुल और बेन्दू से अपनी झोपड़ी बनाकर जीवन यापन करते आए हैं, उन्हें भी अब यह सामग्री लेने से रोका जा रहा है। इससे गरीब परिवारों के सामने रहने का संकट खड़ा हो गया है। इसी के साथ रिहायशी इलाकों में बंदरों का उत्पात लगातार बढ़ रहा है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा खतरे में है, खेतों और घरों का नुकसान अलग से हो रहा है, लेकिन इस पर कोई ठोस व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही। जंगल की तार फेंसिंग कई स्थानों पर अधूरी है, जिसके कारण जंगली जानवर आसानी से गांवों और खेतों में आ जाते हैं।आज स्थिति यह है कि जंगल के जानवर गांव में घूम रहे हैं और ग्रामीण डर के साये में जी रहे हैं। एक और गंभीर विषय है कि वन विभाग के मजदूरों का शोषण होने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। मजदूरों से काम लिया जाता है, लेकिन उन्हें उचित मजदूरी और सम्मान नहीं मिलता। यह बिल्कुल उचित नहीं है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जहां ग्रामीणों को लकड़ी लेने से रोका जाता है, वहीं विभाग की चौकियों, बैरियर और तांड में जंगली लकड़ी का उपयोग होता दिखाई देता है। इससे लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि नियम आखिर किसके लिए हैं। कई जगह वन विभाग के कर्मचारियों का व्यवहार भी ग्रामीणों के प्रति सहयोगात्मक नहीं रहता, जिससे छोटी-छोटी बातें विवाद का रूप ले लेती हैं। इसके अलावा सड़क किनारे उगी झाड़ियों की सफाई नहीं होने से दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। जंगल की पटरियां तो बार-बार साफ होती हैं, लेकिन गांवों से गुजरने वाली सड़कों की अनदेखी की जा रही है और सबसे महत्वपूर्ण बात, वन क्षेत्र में पड़ने वाले धार्मिक स्थलों पर पाबंदियां लगा दी गई हैं, जिससे स्थानीय लोगों की आस्था और परंपराएं प्रभावित हो रही हैं। बैठक में मांग की गई कि वन संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों के अधिकार, सुरक्षा और सम्मान का भी ध्यान रखा जाए।

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