“मिट्टी की खुशबू में दीपावली की रौनक — कुम्हारों ने बनाई परंपरा की लौ”

“मिट्टी की खुशबू में दीपावली की रौनक — कुम्हारों ने बनाई परंपरा की लौ”
पीलीभीत। कलीनगर व गजरौला क्षेत्र के पचपेड़ा गाँव में आज भी मिट्टी की खुशबू और परंपरा की रोशनी जीवित है। जहां शहरों में इलेक्ट्रॉनिक लाइटों की चमक बढ़ रही है, वहीं इस गाँव के कुम्हार परिवार हाथों से बनाए मिट्टी के दीयों से दीपावली की असली रौनक बिखेर रहे हैं।धर्मपाल अपने परिवार — पत्नी देववती, बेटा विनोद कुमार और बेटी सविता देवी के साथ पूरी तन्मयता से दीपक बना रहे हैं। सुबह से शाम तक चाक पर मिट्टी को आकार देते हुए, वे हर घर में रोशनी पहुंचाने की तैयारी में जुटे हैं। धर्मपाल की पत्नी देववती बताती हैं, “दीपक बनाना सिर्फ काम नहीं, हमारे पूर्वजों की विरासत है। इसे निभाना हमारा धर्म है।”इसी गाँव के घनश्याम पुत्र लीलाधर भी अपने पिता और बच्चों के साथ परंपरागत दीपक तैयार कर रहे हैं। वहीं, नत्थू लाल पुत्र सुखलाल झांझन लाल (47 वर्ष) अपने बेटों अंकित, टिंकू और बेटी निशा के साथ इस पुश्तैनी पेशे को आगे बढ़ा रहे हैं। नत्थू लाल कहते हैं, “हमने अपने बच्चों की शादी कर दी, लेकिन आज भी परिवार की रोज़ी-रोटी मजदूरी और दीपक बनाने से ही चलती है।”कुम्हार परिवारों ने साझा किया कि पहले दीपावली के सीजन में उनके बनाए दीपकों की भारी मांग रहती थी, लेकिन अब डिस्पोज़ेबल बर्तनों और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण मिट्टी के दीपक का चलन कम हो गया है। इसके अलावा, चिकनी मिट्टी पास में नहीं मिलती, उसे दूर तालाबों से लाना पड़ता है, जिससे मेहनत और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं।घनश्याम ने बताया कि उन्होंने विश्वकर्मा योजना में आवेदन किया था, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। फिर भी, परिवार ने हार नहीं मानी। दीपावली पर हर साल मिट्टी के दीपक बनाकर वे बाजार में बेचते हैं। उनका कहना है, “जब तक सांस है, तब तक मिट्टी से दीप बनाना नहीं छोड़ेंगे। यही हमारी पहचान और रोज़गार है। बच्चों को भी यही काम सिखा रहे हैं। इस बीच, धर्मपाल ने गाँव के ग्राम प्रधान सुरेश वर्मा और पिपरिया भजा के पूर्व प्रधान सुखलाल कश्यप को मिट्टी के दीपक भेंट करते हुए क्षेत्रवासियों से अपील की कि इस दीपावली पर स्थानीय कुम्हारों के हाथों से बने दीपक जलाएँ। उनका कहना है कि इससे न केवल परंपरा जीवित रहेगी, बल्कि ग्रामीण परिवारों के घरों में खुशियों की रोशनी भी पहुंचेगी।बाजार की चमक के बीच, पचपेड़ा के ये कुम्हार आज भी उम्मीद की वह लौ जलाए हुए हैं, जो मिट्टी से जन्म लेती है और आस्था से जगमगाती है।




